UP: हाथरस का पीड़ित परिवार 6 साल बाद भी सुरक्षा घेरे में, अब हाई कोर्ट ने दिया पुनर्वास का आदेश; परिवार की क्या हैं मांगें?

उत्तर प्रदेश के हाथरस का वह मामला, जिसने साल 2020 में पूरे देश को झकझोर दिया था, छह साल बाद भी पूरी तरह अतीत का हिस्सा नहीं बन पाया है। घटना के बाद परिवार को सुरक्षा दी गई और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन परिवार का कहना है कि उसकी जिंदगी आज भी सामान्य नहीं हो सकी है। घर के बाहर सुरक्षा व्यवस्था, रोजगार की चिंता, बच्चों के भविष्य और गांव से बाहर बसने की मांग—ये सवाल अब भी परिवार के सामने हैं।

इसी बीच अगस्त 2026 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश ने इस मामले को एक बार फिर चर्चा में ला दिया। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पीड़ित परिवार को नोएडा या गाजियाबाद में तीन महीने के भीतर पुनर्वासित करने का निर्देश दिया है। अदालत ने राज्य के पहले के उस निर्णय को भी रद्द कर दिया, जिसमें परिवार के लिए कासगंज, एटा या अलीगढ़ जैसे स्थानों का विकल्प दिया गया था।

लेकिन इस खबर का असली मानवीय पहलू केवल इतना नहीं है कि परिवार को कहां बसाया जाएगा। बड़ा सवाल यह है कि छह साल तक सुरक्षा के बीच रहने के बाद परिवार कब अपने जीवन को दोबारा सामान्य तरीके से शुरू कर पाएगा?

छह साल से सुरक्षा के बीच जिंदगी

2020 के मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पीड़ित परिवार और गवाहों की सुरक्षा के लिए CRPF को जिम्मेदारी दी गई थी। अक्टूबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने परिवार और गवाहों को CRPF सुरक्षा देने का निर्देश दिया था।

सुरक्षा का उद्देश्य परिवार को किसी संभावित खतरे से बचाना था। लेकिन वर्षों बाद परिवार का कहना है कि यही सुरक्षा व्यवस्था उनके रोजमर्रा के जीवन को भी प्रभावित कर रही है।

अगस्त 2026 की रिपोर्टों में परिवार के सदस्यों ने बताया कि वे लंबे समय से सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। परिवार के अनुसार, लगातार सुरक्षा के कारण बाहर जाकर काम करना आसान नहीं रहा और आर्थिक परेशानियां भी बढ़ी हैं।

परिवार के एक सदस्य ने मीडिया से अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि इतने वर्षों में उनका सामान्य सामाजिक जीवन लगभग खत्म हो गया है। परिवार ने यह भी कहा कि कोर्ट की सुनवाई के लिए दूसरे शहरों में जाने का खर्च और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े खर्च उनकी आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव डालते रहे हैं।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये परिवार द्वारा बताई गई परिस्थितियां हैं। इन्हें सरकार या अदालत द्वारा स्थापित प्रत्येक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

मामला 2020 का है, लेकिन सवाल आज भी बाकी हैं

हाथरस के बुलगढ़ी गांव का यह मामला वर्ष 2020 में सामने आया था। 19 वर्षीय दलित युवती की मौत के बाद मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। जांच CBI को सौंपी गई और बाद में मामला अदालत तक पहुंचा।

उस समय हुई घटनाओं, जांच और अंतिम संस्कार को लेकर भी देशभर में सवाल उठे थे। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की निगरानी इलाहाबाद हाई कोर्ट को सौंपी थी और परिवार तथा गवाहों की सुरक्षा के लिए CRPF की व्यवस्था की थी।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान परिवार की सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी रही।

आज छह साल बाद मामला एक अलग सवाल के साथ सामने है—क्या परिवार को केवल सुरक्षा उपलब्ध कराना पर्याप्त है, या उसे ऐसी जगह और परिस्थितियां भी मिलनी चाहिए जहां वह रोजगार, बच्चों की शिक्षा और सामाजिक जीवन के साथ आगे बढ़ सके?

यही सवाल अब High Court के सामने rehabilitation यानी पुनर्वास की बहस के केंद्र में है।

CBI जांच के बाद अदालत में क्या हुआ?

इस मामले में CBI ने जांच की और चार आरोपियों के खिलाफ अदालत में मामला चला। मार्च 2023 में हाथरस की अदालत ने चार में से तीन आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि चौथे आरोपी संदीप को गैर-इरादतन हत्या से संबंधित प्रावधान और SC/ST Act के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा दी। उसे rape और murder के आरोपों में दोषी नहीं ठहराया गया था।

इस न्यायिक स्थिति को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि अक्सर पुराने मामलों की रिपोर्टिंग में सभी आरोपियों को एक ही कानूनी स्थिति में दिखा दिया जाता है। इस मामले में ऐसा करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

अदालत का फैसला आने के बाद भी मामले से जुड़े कानूनी मुद्दे और परिवार की rehabilitation से संबंधित प्रक्रिया अलग स्तर पर चलती रही।

परिवार के पुनर्वास की मांग क्यों उठी?

परिवार की ओर से लंबे समय से यह मांग रही है कि उन्हें हाथरस से बाहर ऐसी जगह बसाया जाए जहां वे सुरक्षा के साथ सामान्य जीवन जी सकें।

परिवार ने पहले दिल्ली और बाद में नोएडा या गाजियाबाद में relocation की इच्छा जताई। इसके पीछे परिवार की ओर से सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक support जैसे कारण बताए गए हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, नोएडा और गाजियाबाद में परिवार के अन्य रिश्तेदार रहते हैं। परिवार का मानना है कि वहां जाने पर उन्हें अकेलेपन से बाहर निकलने और रोजगार तलाशने के अधिक अवसर मिल सकते हैं।

इसके विपरीत, राज्य सरकार ने पहले कासगंज, एटा और अलीगढ़ में rehabilitation का विकल्प दिया था।

परिवार ने इन विकल्पों को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं व्यक्त की थीं। परिवार की ओर से अदालत में यह तर्क भी दिया गया कि ये स्थान हाथरस के अपेक्षाकृत करीब हैं और वहां उनके रिश्तेदार भी नहीं हैं।

High Court में मामला कैसे आगे बढ़ा?

यह मामला अचानक अगस्त 2026 में सामने नहीं आया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जुलाई 2022 में ही राज्य सरकार को परिवार को हाथरस से बाहर किसी दूसरी जगह बसाने पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसमें परिवार के social और economic rehabilitation तथा बच्चों की educational needs को ध्यान में रखने की बात कही गई थी।

बाद में परिवार ने नोएडा या गाजियाबाद में relocation की इच्छा जताई।

14 नवंबर 2024 को हाई कोर्ट ने परिवार को औपचारिक आवेदन देने को कहा। परिवार ने 2 दिसंबर 2024 को आवेदन किया। लेकिन राज्य सरकार ने 22 फरवरी 2025 को जो निर्णय लिया, उसमें फिर कासगंज, एटा और अलीगढ़ को विकल्प के तौर पर रखा गया।

यहीं से विवाद फिर अदालत के सामने पहुंचा।

24 अगस्त 2026 को High Court ने क्या कहा?

अगस्त 2026 में न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की पीठ ने राज्य सरकार के 22 फरवरी 2025 के निर्णय को रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि जब पहले परिवार की ओर से नोएडा या गाजियाबाद में rehabilitation के अनुरोध पर विचार करने का निर्देश दिया गया था, तो सरकार के निर्णय में उस अनुरोध पर उचित विचार दिखाई देना चाहिए था। कोर्ट के अनुसार, सरकार का 2025 का निर्णय परिवार की उस specific request को संबोधित नहीं करता था।

इसके बाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि परिवार को गाजियाबाद या नोएडा में तीन महीने के भीतर rehabilitate और relocate किया जाए।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि rehabilitation होने के बाद परिवार के एक सदस्य को रोजगार दिया जाए, जैसा कि उसके 2022 के आदेश और राज्य की undertaking में कहा गया था।

Court ने compliance को लेकर भी क्या कहा?

इस आदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसका compliance mechanism है।

हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश के पालन को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के Additional Chief Secretary (Home) की ओर से compliance affidavit दाखिल किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि निर्देश का पालन नहीं हुआ तो अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत के सामने उपस्थित होना पड़ सकता है।

इसका अर्थ यह है कि मामला केवल “सरकार को विचार करना चाहिए” जैसे सामान्य निर्देश तक सीमित नहीं रहा। कोर्ट ने relocation के लिए स्पष्ट स्थान और समयसीमा तय की है।

अब आगे की महत्वपूर्ण प्रक्रिया यह होगी कि सरकार इस आदेश को किस तरह लागू करती है।

परिवार की क्या-क्या मांगें हैं?

परिवार की मांगों को broadly चार प्रमुख हिस्सों में समझा जा सकता है।

1. हाथरस से बाहर सुरक्षित पुनर्वास

परिवार चाहता है कि उसे ऐसे स्थान पर बसाया जाए जहां सुरक्षा के साथ वह सामान्य जीवन भी जी सके।

नोएडा और गाजियाबाद को लेकर परिवार की preference का एक कारण वहां रिश्तेदारों की मौजूदगी और NCR में उपलब्ध सामाजिक तथा रोजगार के अवसर बताए गए हैं।

2. परिवार के एक सदस्य को रोजगार

सरकारी नौकरी का मुद्दा इस rehabilitation process का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

High Court ने अपने नए आदेश में भी कहा है कि relocation के बाद एक family member को employment दिया जाए।

परिवार के लिए इसका महत्व सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं है। परिवार का कहना है कि रोजगार मिलने से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का रास्ता खुलेगा।

3. बच्चों की शिक्षा

परिवार के बच्चों की शिक्षा भी अदालत के पुराने rehabilitation directions का हिस्सा रही है।

जुलाई 2022 के आदेश में High Court ने relocation पर विचार करते समय बच्चों की educational needs को ध्यान में रखने की बात कही थी।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि छह साल तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया का असर केवल उस समय के वयस्क सदस्यों तक सीमित नहीं रहता। बच्चों का भविष्य भी ऐसी परिस्थितियों से प्रभावित हो सकता है।

4. सामान्य सामाजिक जीवन

शायद परिवार की सबसे मानवीय मांग यही है—सुरक्षा के साथ सामान्य जिंदगी।

परिवार का कहना है कि लगातार सुरक्षा घेरे में रहने से रिश्तेदारों से मिलना, काम पर जाना और सामान्य सामाजिक गतिविधियां मुश्किल हुई हैं।

यही वजह है कि परिवार के लिए relocation केवल घर बदलने का मामला नहीं है। उनके अनुसार यह उनके जीवन को फिर से व्यवस्थित करने का अवसर है।

सुरक्षा और सामान्य जिंदगी के बीच संतुलन

इस पूरे मामले में एक जटिल सवाल सुरक्षा व्यवस्था का भी है।

2020 में CRPF सुरक्षा का फैसला परिवार और गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे confidence-building measure के तौर पर निर्देशित किया था।

छह साल बाद परिवार की स्थिति को देखते हुए अब rehabilitation का सवाल सामने है।

यह कहना सही नहीं होगा कि सुरक्षा अपने आप में परिवार के लिए नुकसान है। सुरक्षा का उद्देश्य उनकी रक्षा करना है। लेकिन परिवार का अनुभव यह है कि लंबे समय तक उसी सुरक्षा व्यवस्था के बीच रहने से उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन पर असर पड़ा है।

इसलिए High Court का नया आदेश सुरक्षा और rehabilitation—दोनों पहलुओं को एक साथ देखने की कोशिश के रूप में सामने आता है।

अब आगे क्या होगा?

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल आदेश के implementation का है।

High Court ने राज्य सरकार को तीन महीने की समयसीमा दी है। इस दौरान सरकार को परिवार के लिए Noida या Ghaziabad में rehabilitation की व्यवस्था करनी होगी। इसके साथ एक family member के employment से जुड़ी व्यवस्था भी करनी होगी।

Compliance affidavit अदालत को यह बताने का माध्यम होगा कि आदेश पर क्या कार्रवाई की गई।

परिवार ने इस आदेश का स्वागत किया है, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार पहले के निर्देशों के implementation में देरी को देखते हुए परिवार को अब भी आशंका है कि इस बार आदेश कितनी जल्दी जमीन पर लागू होगा।

यानी फिलहाल Court का आदेश आ चुका है, लेकिन relocation को पूरा हुआ मानना अभी जल्दबाजी होगी।

छह साल बाद सबसे बड़ा सवाल

हाथरस का यह मामला अब केवल 2020 की घटना या उसके बाद हुई कानूनी कार्रवाई की कहानी नहीं रह गया है।

छह साल के लंबे समय में एक परिवार की जिंदगी किस तरह बदलती है, यह इस मामले का मानवीय पहलू है।

एक तरफ सुरक्षा है। दूसरी तरफ उसी सुरक्षा के बीच सामान्य जीवन की कमी की परिवार की शिकायत है।

एक तरफ अदालत की कानूनी प्रक्रिया है। दूसरी तरफ रोजगार और बच्चों के भविष्य की चिंता है।

और अब इन सबके बीच High Court ने rehabilitation के लिए एक स्पष्ट रास्ता तय किया है—Noida या Ghaziabad में तीन महीने के भीतर relocation।

अब देखना यह होगा कि यह आदेश परिवार के लिए कागज पर दर्ज एक और निर्देश बनकर रह जाता है या वास्तव में उनकी जिंदगी में वह बदलाव आता है जिसकी वे वर्षों से मांग कर रहे हैं।

निष्कर्ष

हाथरस का 2020 का मामला छह साल बाद भी इसलिए चर्चा में है क्योंकि परिवार की सुरक्षा और rehabilitation का सवाल अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। परिवार का कहना है कि लगातार सुरक्षा के बीच उसका सामान्य सामाजिक और आर्थिक जीवन प्रभावित हुआ है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अगस्त 2026 में राज्य सरकार को परिवार को नोएडा या गाजियाबाद में तीन महीने के भीतर पुनर्वासित करने का निर्देश दिया है और एक सदस्य को रोजगार देने की बात भी दोहराई है।

अब इस मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण Court के आदेश का वास्तविक implementation होगा। यही तय करेगा कि छह साल से चली आ रही rehabilitation की मांग परिवार के लिए आखिरकार एक वास्तविक बदलाव में बदलती है या नहीं।


FACT CHECK STATUS

Verified Facts

  • मामला 2020 के हाथरस प्रकरण से संबंधित है।
  • परिवार को CRPF सुरक्षा दिए जाने का Supreme Court का 2020 का निर्देश मौजूद है।
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2022 में परिवार के rehabilitation/relocation पर विचार करने का निर्देश दिया था।
  • 22 फरवरी 2025 के राज्य सरकार के निर्णय में कासगंज, एटा और अलीगढ़ के विकल्प दिए गए थे।
  • 24 अगस्त 2026 के High Court order ने उस निर्णय को set aside किया।
  • Court ने Noida या Ghaziabad में तीन महीने के भीतर relocation का निर्देश दिया।
  • Rehabilitation के बाद परिवार के एक सदस्य को employment देने का निर्देश दिया गया है।

Claims / Allegations

  • परिवार का कहना है कि लंबे समय की सुरक्षा व्यवस्था ने उसके social life और employment को प्रभावित किया।
  • परिवार ने आर्थिक कठिनाइयों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं की बात कही है।
  • परिवार का मानना है कि Noida/Ghaziabad में relocation से रोजगार और बच्चों की शिक्षा के बेहतर अवसर मिल सकते हैं।

Information Still Unconfirmed

  • तीन महीने की समयसीमा में relocation वास्तव में पूरा होगा या नहीं।
  • परिवार को Noida या Ghaziabad में कौन-सा specific accommodation मिलेगा।
  • रोजगार की व्यवस्था कब और किस पद पर होगी।
  • भविष्य में security arrangement में क्या बदलाव किया जाएगा।

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