गाजियाबाद की तीन बेटियां जिनकी एक गेम ने जान ले ली


(निशिका 16, प्राची 14, पाखी 12 – एक मर्डर मिस्ट्री)


वो रात, जो गाज़ियाबाद कभी नहीं भूल पाएगा

गाज़ियाबाद की एक सामान्य सी कॉलोनी।
छोटे-छोटे घर, तंग गलियाँ, सुबह काम पर जाने की जल्दी और रात को टीवी की आवाज़।
इसी कॉलोनी में एक घर था, जहाँ तीन बहनें रहती थीं — जिनके पिता का नाम था चेतन गुर्जर जिनकी 3 बेटी थी
निशिका, प्राची और पाखी

तीनों बहनें।
तीनों नाबालिग।
और तीनों की ज़िंदगी एक ही रात में खत्म।

उस रात किसी ने नहीं सोचा था कि सुबह जब सूरज उगेगा, तो उसी घर से तीन लाशें निकलेंगी — और पूरा शहर एक ही सवाल पूछेगा:

आख़िर तीन मासूम बेटियों की हत्या किसने की? और क्यों?


तीन बहनें, तीन सपने

निशिका (16 साल)

घर की सबसे बड़ी बेटी।
दसवीं की छात्रा। पढ़ाई में तेज़, थोड़ी जिम्मेदार।
माँ की मदद करती थी, छोटी बहनों का ख्याल रखती थी।
उसका सपना था — नर्स बनना

प्राची (14 साल)

आठवीं में पढ़ती थी।
हँसमुख, बातूनी, हर बात पर सवाल पूछने वाली।
डायरी लिखने का शौक।
अक्सर कहती थी — “मैं टीचर बनूँगी।”

पाखी (12 साल)

सबसे छोटी।
अब भी बचपना चेहरे पर था।
कार्टून, चॉकलेट और गुड़ियों की दुनिया में रहने वाली।
उसकी सबसे बड़ी खुशी — दोनों दीदियों के साथ सोना।

तीनों बहनों के बीच गहरा रिश्ता था।
लड़ाई भी होती थी, प्यार भी।

और शायद उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि
वो आख़िरी रात है।


सुबह जिसने सब बदल दिया

सुबह करीब 6:30 बजे पड़ोसियों ने देखा —
घर का दरवाज़ा अंदर से बंद था।
लेकिन भीतर से कोई हलचल नहीं।

माँ की आवाज़ नहीं।
बेटियों की हँसी नहीं।

कुछ देर बाद चीख सुनाई दी।

दरवाज़ा तोड़ा गया।

और जो नज़ारा सामने आया,
उसने पुलिस तक को हिला दिया।


क्राइम सीन – अंदर का मंजर

कमरे में तीनों बहनें थीं।

  • निशिका बिस्तर पर
  • प्राची फर्श पर
  • पाखी कोने में

तीनों के शरीर पर
जिसने के निशान
गला दबाने के सबूत
चेहरे पर डर

कोई खून बिखरा नहीं था।
मतलब साफ़ था —
ये हत्या गुस्से में नहीं, सोच-समझकर की गई थी।


घर के लोग कहाँ थे?

सबसे बड़ा सवाल यही था।

  • पिता — घर से बाहर
  • माँ — अचेत हालत में, ज़िंदा

माँ को अस्पताल ले जाया गया।
वहाँ पता चला —
उसे नींद की दवा या नशीला पदार्थ दिया गया था।

मतलब साफ़ था:
हत्यारे ने जानबूझकर माँ को बेहोश किया।


पुलिस की एंट्री और शुरुआती जांच

सूचना मिलते ही:

  • स्थानीय पुलिस
  • क्राइम ब्रांच
  • फॉरेंसिक टीम

सब मौके पर पहुँचे।

पहला सवाल:
घर में जबरन घुसने के निशान क्यों नहीं?

दरवाज़ा अंदर से बंद।
खिड़की सही सलामत।

इसका मतलब —
हत्यारा कोई अपना हो सकता है।


शक की पहली सुई – पिता की तरफ

क्राइम में सबसे पहले शक अक्सर
घर के मुखिया पर जाता है।

पिता से पूछताछ हुई।

उसने कहा:

“मैं काम पर गया था… मुझे कुछ नहीं पता।”

लेकिन सवाल उठे:

  • घरेलू तनाव?
  • आर्थिक परेशानी?
  • बेटियों से नाराज़गी?

पड़ोसियों ने बताया:
घर में अक्सर झगड़े होते थे।

लेकिन क्या इतना बड़ा झगड़ा तीन हत्याओं तक ले जा सकता है?


माँ का बयान – अधूरा सच

होश में आने के बाद माँ ने कहा:

“मुझे रात को चाय दी गई… फिर कुछ याद नहीं।”

पर सवाल ये था:

  • चाय किसने दी?
  • किस समय दी?
  • माँ को क्यों ज़िंदा छोड़ा गया?

अगर बाहर का कोई होता,
तो माँ भी मारी जाती।

तो फिर…?


बहनों की हत्या का तरीका – एक-एक कर

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने कई राज़ खोले।

  • पहले पाखी
  • फिर प्राची
  • आखिर में निशिका

मतलब:
सबसे पहले सबसे कमजोर को मारा गया।

और सबसे आखिर में सबसे बड़ी, जिसने शायद विरोध किया।

यह किसी जानकार व्यक्ति का काम लग रहा था।


मोबाइल, कॉल और वो आख़िरी बातें

पुलिस ने मोबाइल फोन खंगाले।

  • निशिका की आख़िरी कॉल
  • प्राची की डायरी
  • पाखी की स्कूल कॉपी

डायरी में एक लाइन मिली:

“घर में सब ठीक नहीं है…”

ये लाइन
पूरे केस की आत्मा बन गई।


पड़ोसियों की गवाही

पड़ोसी बोले:

  • रात में कोई चीख नहीं सुनी
  • कोई भागता नहीं दिखा
  • सब कुछ बहुत शांत था

शांत हत्या…
जो डर पैदा करती है।


हत्या का मकसद – क्यों मारी गईं तीन बेटियाँ?

यह सवाल सबसे भारी था।

संभावनाएँ:

  1. पारिवारिक कलह
  2. सम्मान का डर
  3. मानसिक दबाव
  4. आर्थिक बोझ

कुछ लोग बोले:

“तीन बेटियाँ… खर्च…”

लेकिन क्या ये सोच
इतनी बेरहम हो सकती है?



. एक सवाल जो आज भी ज़िंदा है

अगर हत्यारा अपना था,
तो वो हर रोज़
उन मासूम चेहरों को देखता था।

  • निशिका की जिम्मेदारी
  • प्राची की बातें
  • पाखी की मुस्कान

फिर भी

ये सिर्फ हत्या नहीं, सिस्टम की हार है

ये केस सिर्फ तीन हत्याओं की कहानी नहीं।

ये कहानी है:

  • टूटते परिवारों की
  • बेटियों को बोझ समझने की
  • मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी की

तीन बेटियाँ मरीं
लेकिन सवाल पूरे समाज पर खड़ा हुआ।


अंत नहीं, एक चेतावनी

निशिका, प्राची और पाखी
अब नहीं हैं।

लेकिन उनकी कहानी
हर घर के दरवाज़े पर सवाल छोड़ गई:

क्या हम अपने बच्चों की आवाज़ सुन रहे हैं?
क्या बेटियाँ आज भी सुरक्षित हैं?

जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते,
ये मर्डर मिस्ट्री ज़िंदा रहेगी

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