दिल्ली में बच्चे क्यों खो रहे है


दिल्ली: जहाँ बच्चे खो जाते हैं… और फाइलें सो जाती हैं

1. शहर जो जागता है, बच्चे जो गायब हो जाते हैं

दिल्ली—भारत की राजधानी।
वीआईपी सायरन, लाल बत्ती, चमचमाती इमारतें…
लेकिन इसी शहर में हर साल हज़ारों बच्चे गुम हो जाते हैं।

ये कोई फिल्म की कहानी नहीं है।
ये कोई अफवाह नहीं है।
ये सरकारी रिकॉर्ड का सच है।

सवाल ये नहीं कि बच्चे गुम क्यों हो रहे हैं।
सवाल ये है कि जब एक बच्चा गायब होता है, तो सिस्टम क्यों नहीं हिलता?

हर दिन—

  • कोई माँ थाने के बाहर बैठी रोती है
  • कोई बाप पोस्टर छपवाता है
  • कोई बच्चा किसी अजनबी शहर में अपनी पहचान भूल रहा होता है

और दिल्ली…
दिल्ली आगे बढ़ जाती है।


2. “साहब, मेरा बच्चा लौट आएगा न?”

उत्तर-पूर्वी दिल्ली का एक छोटा सा इलाका।
तंग गलियाँ।
नालियों की बदबू।
और एक घर, जहाँ पिछले 11 महीने से चूल्हा तो जलता है, लेकिन हँसी नहीं।

रीना देवी का 9 साल का बेटा—राहुल
स्कूल से लौटते वक्त गुम हो गया।

न फिरौती आई।
न कोई फोन।
न कोई सुराग।

रीना कहती है—

साहब, अगर मर गया होता तो लाश मिल जाती…
लेकिन जब बच्चा गुम हो जाता है न…
तो हर साँस उम्मीद में कटती है।”

पुलिस ने FIR लिखी।
फिर एक लाइन जो हर माँ सुनती है

“आप चिंता मत कीजिए, मिल जाएगा।”

लेकिन सवाल ये है—
अब तक कितने मिले?


3. आंकड़े जो चीखते हैं, पर सुने नहीं जाते

सरकारी डेटा कहता है—
दिल्ली में हर साल 10,000 से ज़्यादा बच्चे गुम होते हैं।

कुछ मिल जाते हैं।
कुछ कभी नहीं।

जो नहीं मिलते—

  • वो किस फैक्ट्री में काम कर रहे हैं?
  • किस रैकेट के हाथ लगे हैं?
  • ज़िंदा हैं या नहीं—किसे पता?

और सबसे खतरनाक सवाल
क्या कोई जानना भी चाहता है?


4. गुमशुदगी नहीं, यह एक इंडस्ट्री है

जब हमने केस फाइलें खंगालीं,
तो एक पैटर्न सामने आया।

  • स्टेशन
  • बस स्टैंड
  • निर्माण स्थल
  • झुग्गी इलाके

यहीं से बच्चे गायब होते हैं।

और फिर—

  • बाल मज़दूरी
  • भीख मंगवाने वाले गिरोह
  • अवैध गोद लेने का धंधा
  • और सबसे डरावना—ह्यूमन ट्रैफिकिंग

ये कोई इक्का-दुक्का अपराध नहीं है।
ये एक चलती हुई इंडस्ट्री है।

लेकिन सवाल वही
इंडस्ट्री चल कैसे रही है, बिना सिस्टम की मदद के?


5. जब FIR भी आधी लिखी जाती है

एक रिटायर्ड पुलिस अफसर नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं—

90% मामलों में FIR देर से होती है।
कई बार तो गुमशुदगी को ‘भाग गया होगा’ कहकर टाल दिया जाता है।”

और ये शुरुआती 24 घंटे
जो बच्चे को ढूँढने के लिए सबसे अहम होते हैं
यूँ ही निकल जाते हैं।

फिर पोस्टर।
फिर NGO।
फिर अदालत।
और अंत में…
चुप्पी।


6. NGO जो सिस्टम से पहले पहुँच जाते हैं

दिल्ली में कुछ NGO हैं,
जो पुलिस से पहले बच्चों तक पहुँच जाते हैं।

एक NGO वर्कर कहती है—

हमने ऐसे बच्चे पाए हैं जिन्हें सालों बाद छुड़ाया गया।
वो अपने माँ-बाप का नाम तक भूल चुके थे।”

सोचिए—
एक बच्चा,
जो कभी स्कूल बैग उठाता था,
अब ईंट ढोता है।

और दिल्ली?
दिल्ली मेट्रो बना रही है।


7. अदालत के सवाल, सरकार की खामोशी

दिल्ली हाईकोर्ट कई बार सवाल उठा चुका है

  • ट्रैकिंग सिस्टम कहाँ है?
  • इंटर-स्टेट कोऑर्डिनेशन क्यों नहीं?
  • बाल संरक्षण कानून कागज़ों में क्यों है?

हर बार जवाब आता है
“काम चल रहा है।”

लेकिन बच्चे…
चलते-चलते गुम हो रहे हैं।


8. एक बच्चा, जो वापस आया… लेकिन पूरा नहीं

12 साल का अमन।
चार साल बाद मिला।

वो घर लौटा,
लेकिन उसकी आँखों में डर था।

उसने बस इतना कहा

“मुझे फिर मत जाने देना।”

और यहीं ये कहानी सिर्फ क्राइम नहीं रहती…
ये समाज की नाकामी बन जाती है।


9. सबसे आख़िरी सवाल

जब एक मोबाइल चोरी होता है
तो IMEI ट्रैक हो जाता है।

लेकिन जब एक बच्चा चोरी होता है
तो क्यों नहीं?

क्या इसलिए कि
मोबाइल महँगा है,
और गरीब का बच्चा सस्ता?


यह सिर्फ कहानी नहीं है। यह चेतावनी है।

  • बच्चों की तस्करी के पूरे नेटवर्क
  • पुलिस की अंदरूनी फाइलें
  • असली केस स्टडी
  • और वो सवाल, जिनसे सरकार असहज होती है

जिस दिन बच्चा गुम होता है, उस दिन एक पूरा सिस्टम बेनकाब होता है

10. गुमशुदगी के बाद की पहली 24 घंटे: सबसे बड़ी चूक

दिल्ली पुलिस की फाइलों में एक शब्द बार-बार मिलता है—
“लास्ट सीन”

मतलब बच्चा आख़िरी बार कहाँ देखा गया।

लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि
अक्सर पुलिस पहले दिन खोज ही नहीं करती

माँ-बाप को कहा जाता है

“थोड़ा इंतज़ार कीजिए, शायद खुद लौट आए।”

ये इंतज़ार
कई बार ज़िंदगी भर का इंतज़ार बन जाता है।

क्योंकि जो रैकेट बच्चों को उठाते हैं,
उन्हें पता है
पहले 24 घंटे निकल गए, तो आधी लड़ाई जीत ली।


11. रेलवे स्टेशन: जहाँ बच्चे सबसे पहले टूटते हैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन।
भीड़।
शोर।
और प्लेटफॉर्म नंबर 16 के पास बैठा एक बच्चा।

नाम—किसी को नहीं पता।
उम्र—लगभग 10 साल।

NGO वर्कर बताती है

“ये बच्चे शुरुआत में रोते हैं।
फिर कोई उन्हें खाना देता है।
फिर काम।
और फिर… ज़िंदगी।”

यहीं से शुरू होता है ब्रेकिंग प्रोसेस

  • नाम छीन लिया जाता है
  • पहचान मिटा दी जाती है
  • डर को आदत बना दिया जाता है

और एक बच्चा…
सिस्टम के लिए नंबर बन जाता है।


12. दिल्ली से बाहर, लेकिन दिल्ली के ही बच्चे

ज्यादातर गुम बच्चे
दिल्ली में नहीं मिलते।

मिलते हैं—

  • हरियाणा
  • राजस्थान
  • उत्तर प्रदेश
  • बिहार
  • बंगाल

क्यों?

क्योंकि एक राज्य में ढूँढना आसान होता है।
दूसरे राज्य में ज़िम्मेदारी बँट जाती है

एक अफसर कहता है

“दूसरे राज्य से जवाब आने में महीनों लग जाते हैं।”

और महीनों में
बच्चा बदल जाता है।


13. फैक्ट्रियाँ, ढाबे और ईंट भट्टे

अगर आप किसी ढाबे पर काम करता बच्चा देखें
तो खुद से एक सवाल पूछिए

क्या वो बच्चा सच में वहीं का है?

जाँच में सामने आया
कई ढाबों और फैक्ट्रियों में
नकली उम्र के कागज़ बनाए जाते हैं।

12 साल का बच्चा
18 साल का बना दिया जाता है।

काग़ज़ सही।
ज़मीर ग़लत।


14. भीख का रैकेट: सबसे खामोश अपराध

दिल्ली की ट्रैफिक लाइट्स।
गोद में बच्चा।
आँखों में आँसू।

लेकिन हकीकत?
वो बच्चा अक्सर

  • किराए पर होता है
  • नशे में रखा जाता है
  • जानबूझकर बीमार किया जाता है

क्योंकि—
बीमार बच्चा ज़्यादा कमाता है।

और सवाल
इन बच्चों का हिसाब कौन रखता है?


15. अवैध गोद लेना: नेक इरादे की आड़ में अपराध

हर कोई बच्चा बेचने वाला राक्षस नहीं होता।
कुछ लोग खुद को मसीहा समझते हैं।

“हम तो बच्चे को अच्छा घर दिला रहे हैं।”

लेकिन बिना कानूनी प्रक्रिया
ये अपराध है।

जाँच में सामने आया—

  • 2 लाख
  • 5 लाख
  • 10 लाख

एक बच्चे की कीमत तय होती है।

और माँ?
उसे कहा जाता है

अब बच्चा अच्छे हाथों में है।”

लेकिन कौन से हाथ?
कोई नहीं जानता।


16. कोर्ट की फटकार और फाइलों की धूल

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक सुनवाई में कहा

“अगर ये बच्चे अमीर घरों से होते,
तो क्या तब भी सिस्टम इतना सुस्त होता?”

सवाल कड़ा था।
लेकिन असर?

फाइल बंद।
अगली तारीख।


17. वो माँ, जो अब भी पोस्टर छापती है

सीलमपुर।
एक दीवार पर 3 साल पुराना पोस्टर।

“मेरा बच्चा मिल जाए।”

माँ कहती है—

“जब तक साँस है, पोस्टर लगाऊँगी।”

लेकिन सिस्टम?
वो थक चुका है।


18. एक सच्ची बात, जो कोई नहीं बोलता

गुम हुए ज़्यादातर बच्चे
गरीब हैं।

और गरीब की सबसे बड़ी गलती
वो वोट बैंक तो है,
लेकिन प्राथमिकता नहीं।


19. सवाल, जो आपको असहज करेंगे

  • क्या हर थाने में बाल विशेषज्ञ हैं?
  • क्या हर CCTV सच में काम करता है?
  • क्या हर बच्चा बराबर ज़रूरी है?

अगर जवाब “नहीं” है
तो अगला बच्चा
किसी का भी हो सकता है।


20. आख़िरी सच

ये कहानी किसी एक बच्चे की नहीं।
ये कहानी हम सबकी नाकामी की है।

क्योंकि जिस दिन
एक बच्चा गुम होता है
उस दिन सिर्फ परिवार नहीं टूटता…


अगर अब भी नहीं जागे, तो अगला बच्चा आपका भी हो सकता है

21. कुछ केस जो फाइल नहीं बने, कहानी बन गए

दिल्ली के बाहर, हरियाणा के एक ईंट-भट्ठे से 2023 में 17 बच्चे छुड़ाए गए।
उनमें से 6 बच्चे दिल्ली से गुम थे।

सबसे छोटा—7 साल।
सबसे बड़ा—13 साल।

एक बच्चा बोला

“मुझे बताया गया था कि अब यहीं रहना है।
घर तो बहुत दूर है।”

ये बच्चे गुम नहीं थे।
गायब कर दिए गए थे।


22. पुलिस रिकॉर्ड बनाम ज़मीनी सच

रिकॉर्ड कहता है
“बच्चा बरामद।”

लेकिन सच?

  • माँ को पहचानने में बच्चा हिचकता है
  • भाषा बदल चुकी होती है
  • डर स्थायी हो चुका होता है

बरामदगी कागज़ पर होती है।
वापसी दिल से नहीं।


23. रेस्क्यू के बाद… फिर अंधेरा

एक बड़ा झूठ ये है कि
बच्चा मिल गया, तो कहानी खत्म।

नहीं।

असल कहानी तो इसके बाद शुरू होती है

  • ट्रॉमा
  • डर
  • समाज की बेरुखी
  • स्कूल का ठप्पा: “ये वही बच्चा है”

कई बच्चे फिर भाग जाते हैं।

क्योंकि उन्हें अब
घर से ज़्यादा डर लगता है।


24. बाल सुधार गृह या बाल जेल?

दिल्ली के कुछ चाइल्ड होम्स की रिपोर्ट चौंकाने वाली है।

  • स्टाफ की कमी
  • निगरानी नहीं
  • हिंसा के आरोप

एक सामाजिक कार्यकर्ता कहता है

कई बार बच्चा गुम होकर नहीं,
यहाँ आकर टूटता है।”

सवाल—
क्या हमने बच्चों के लिए सुरक्षित जगह बनाई या सिर्फ दीवारें?


25. सरकार की योजनाएँ और ज़मीन की दूरी

काग़ज़ों में सब है

  • ट्रैकिंग पोर्टल
  • हेल्पलाइन
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट

लेकिन जब माँ थाने जाती है,
तो मिलता है—

ऊपर से आदेश नहीं है।”

तो फिर ये योजनाएँ
किसके लिए हैं?


26. मीडिया: कैमरा है, फॉलोअप नहीं

जब बच्चा गुम होता है—

  • 2 दिन की खबर
  • एक डिबेट
  • फिर अगली ब्रेकिंग

लेकिन सवाल—
कितने चैनल 1 साल बाद वापस जाते हैं?

क्योंकि TRP को
लंबा दर्द पसंद नहीं।


27. हम: सबसे आसान दोषी

हम पूछते हैं—

किसकी गलती है?”

लेकिन कभी नहीं पूछते—

मैंने क्या किया?”

  • हमने पोस्टर देखा और आगे बढ़ गए
  • बच्चे को काम करते देखा और चुप रहे
  • शक हुआ, लेकिन बोला नहीं

क्योंकि
हमें झंझट नहीं चाहिए।


28. अगर सच में कुछ बदलना है

ये भाषण नहीं है।
ये ज़रूरी बातें हैं

  • गुमशुदगी = तुरंत FIR (कोई इंतज़ार नहीं)
  • हर थाने में चाइल्ड डेस्क
  • रेलवे, बस स्टैंड पर रियल मॉनिटरिंग
  • चाइल्ड होम्स की स्वतंत्र जाँच
  • और सबसे ज़रूरी
    सवाल पूछने की आदत

29. एक आख़िरी माँ की बात

एक माँ, जिसका बच्चा 6 साल से गुम है, कहती है

अगर मेरा बच्चा नहीं भी मिला,
तो कम से कम दूसरों का मिल जाए।”

ये माँ बदला नहीं चाहती।
ये माँ सिस्टम चाहती है।


30. अंतिम सवाल (जो टालना मुश्किल है)

जब कोई बच्चा गुम होता है
तो हम कहते हैं

बेचारा।”

लेकिन अगर अगला बच्चा—
आपका हुआ तो?


यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती

क्योंकि दिल्ली में
आज भी कोई बच्चा
घर से निकला होगा…

और शायद
वापस नहीं लौटेगा।

अगर आपने ये पूरी सीरीज़ पढ़ी है,
तो अब आप सिर्फ पाठक नहीं हैं।

आप गवाह हैं।

और गवाह की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी—
खामोश न रहना।


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